सरकारे तो होती है ही निडर चाहे जो कानून करे
किसी के घर मे करे अंधेरा अपने घर मे उजाला भरे
नवंबर ०५ से कानून बना पुरानी पेन्शन बंद करावा दी
अपनो की झोलीया सिलवा कर अपनो मे ही भरवा दी
अभी तो १२ साल हो गये हजारो जिंदगीया बिखर गई
मगरमच के आसू पालते विरोधी पार्टीया निखर गई
वो सत्ता से विहीन हो गये जीन्होने कानून लाया था
भरोसा भी खोया हमने जिनका साथ कभी पाया था
राजनेता तो होते है बईमान उनसे हमदर्दी की आस करे
व्यवस्था ऐसी बनाई की अहसान फारामोश को दास करे
पुराने कर्मचारी बडे ताव से कहते है तुमारे साथ है
मोर्चे मे देखता हु मे एक वाह क्या तुम्हारी बात है
सुना था कभी साथी लोटाभर पाणी एकसाथ बहा जाते
तो अंग्रेज १५० साल तक इस देश को लुटकर क्यो खाते
पेन्शन मार्च का वही दौर फिर से नई रोशनी लाया है
सेवक तो है सालो से भूखा पुराना भरपेट खाया है
मै शर्म से कहता हु मोर्चे मे सिर्फ वही दिखते है
गंदे राजकारण के लिये खुद को बारबार बेचते है
धन्यवाद उनको भी देता हु जो लोकलाज को आते है
हमे मुठीभर हमदर्दी देकर बोरी भरकर ले जाते है
वृद्ध माई से जब मैने पुछा मोर्चे मे क्यो आती है
माई बोली छोटी नाती मा से स्म्भली नही जाती है
शर्म से झुक जाता है सर जो खुद को नेता कहते थे
शांती से देते है कारण वो रोज ड्युटी मे रहते रहे थे
No comments:
Post a Comment