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हमे आज भी सस्ती चिजो का शौक नही सपने बेचने वालो की खामोशीया भी उनके लफ्जो से ज्यादा महँगी होती है |

Thursday, September 14, 2017

ऐसे हो सकता है बिना धन का व्यापार /aise ho sakata hai bhina dhan ke vyapar


आज भी काफी लोग बिना धन के व्यापार करना चाहते है मगर वो ऐसा कर नही पाते. धन के सिवा कोई व्यापार हो ही नही सकता ये बात सही है मगर एक इन्सान को जीवन जिने के लिये बहोत ज्यादा पैसो कि जरुरत नही होती मगर पैसे के बिना जीवन यापन करना नामुमकीन है. मुझे ऐसा लगता है की मेरे अनुभव मे एक इन्सान जो बडे महानगर मे रहता था वो बहोत ही थोडे पैसो मे एक दिन मे २०० रु से ५०० रु कमा लेता था . उसके लिये उसे ज्यादा मेहनत करने की जरुरत नही होती थी.  उसने सिर्फ लोगो की मानसिकता को पह्चान लिया था. रोज सुबह सवेरे अपने लॉटरी भंडार से १०० रु वाली २० से २५ लॉटरी की  टीकिटे खरीद लाता था. ओर किसी बस स्टेशन या रेल्वे स्टेशन पर सिर्फ हात मे एक टिकट दिखाकार बोलता था भाई साहब, मेम साहब मै रोजाना लॉटरी बेचाता हु इसीसे मेरा परिवार चलता है. सभी लॉटरीया बिक गई है आपके नसीब से ये सिर्फ एक बची है मै चाहता हु कि आप इसे खरीदे. लोग यही हमेशा सोचते है के अब मेरे नसीब चमकने वाले है ओर वो तुरंत वो लॉटरी का टिकट खरीद लेते है.  थोडा दूर जाने पर फिर एक लॉटरी का टिकट निकालकर फिर किसी को बेचना उसे खूब आता था.  उसका ये मानना था के अगर मै सभी टिकट दिखाउंगा तो मेरे पास से कोई नही लेगा लेकीन सिर्फ एक दिखाउंगा तो लोग उसके साथ अपनी आस्था को जोडेंगे ओर तुरंत ही खरीद लेंगे.  वही होता भी था. उसे जो वहा जानता था वो कूच नही कहता था क्यो को वो तो एक अपना ओर परिवार का पेट भरने का व्यापार इमानदारी से करता था. इस तऱ्ह वो अपनी सारी टिकीटे जैसे तैसे बेच दिया करता था उनको बेचके जो कमिशन मिलता वो उसकी कमाई होती थी. शायद मेरी नजर मे वो तो एक बडा सिद्ध बिझनेसमेन था.  वो तो MBA से कम नही था. यदी ये माने की वो लोगो को ठगता था तो वो सिर्फ एक ही चीज का विकल्प देता था.ताकी लोग कूच ओर सोच ही न सके जैसे आज बडी टेलिफोन कम्पनिया सोचने का मौका ही नही देती. आचार्य वल्क  ने कहा है की दुनिया मे अपनी पहचान ऐसी करो की लोगो को हर समस्या का समाधान सिर्फ आप लगो भले ही आप न कर सको. www.vinoddahare.blogspot.com       

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