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हमे आज भी सस्ती चिजो का शौक नही सपने बेचने वालो की खामोशीया भी उनके लफ्जो से ज्यादा महँगी होती है |

Friday, August 6, 2021

चुनाव राजनेता और उनकी मानसिकता / chunav rajneta aur unki mansikata

                         

भारत के संविधान का सभी देशवासी नियमित रूप से पालन कर रहे है भारत के संविधान ने हमे हमारे कुछ मौलिक अधिकार दिये है इसलिये हम आज भी एक बढीया जीवन जी रहे है १९४७ मे जब ये देश आझाद हो गया तब शिक्षा का प्रमाण बहोत ही कम था भारतीय राज्यघटना मे चुनाव के बारे मे बडे और सुचारू रूप से लिखित है की इस देश का कोई भी नागरिक इस देश का कोई भी चुनाव लढकर लोगो का प्रतीनिधित्व कर सकता है उस समय जब १९४७ मे देश की जनसंख्या लगभग ३५ करोड के आसपास थी इसलिये शिक्षा के प्रतिशत को ध्यान मे रखकर लोगो की परेशानिया को ध्यान मे रखते हुवे शायद वो सही भी था मगर आज २०२१ मे जब भारत की जनसंख्या १३७ करोड से भी ज्यादा हो गई है अब इसमे सुधार की जरुरत है जब देश मे किसी भी पद के लिये रोजगार या नौकरी की जगह निकलती है तो उसके लिये किसी न किसी प्रकार की शैक्षणिक योग्यता होनी ही चाहिये ऐसे सख्त नियम बनाये गये है मगर समय की मांग है की किसी प्रकार के चुनाव मे भाग लेने के लिये शैक्षणिक योग्यता का प्रमाण होना चाहिये जिसके स्वरूप जनता को उसका फायदा हो सके साथ ही साथ जिस भी विषय या पद के लिये चुनाव हो उस क्षेत्र का ज्ञान होना आवश्यक होना ही चाहिये जिस भी नियुक्त पदाधिकारी को वह जिम्मेदारी दी जाती ही उसकी शैक्षणिक योग्यता उस पद के  लिये होनी ही चाहिये आज भी जब हमारे प्रतिनिधित्व करने वाले आमदार या खासदार की जीवनी को देखते ही तो बहोत ही ज्यादा मात्रा मे वो लोग विभिन्न गुनाह में विभिन्न धाराओ मे गुनहगार के दोषी पाये जाते है उनके विरोध मे अनेको केस न्यायालयो मे आज भी चल रहे है अनेको केस का तो पता ही नही होता अच्छे छवी वाले लोग आज राजनीती मे दिखाना मुश्कील हो गया सा हो गया है लोगो मे आज राजा बनने की होड सी लगी है उचित या अनुचित किसी भी मार्ग का बेदिक्कत ही इस्तमाल करके लोग चुनाव जीत जाते है नैतिकता शायद नाम की रह गई है लोकप्रतिनिधी बनने के बाद मिलने वाला मान सन्मान और बेईमानी द्वारा मिलने वाला धन ये सब पाने के लिये हर कोई अपना पुरा जीवन दाव पर लगा देता है |  किसी एक बार जो उसने एक बार पाया है उसे अपने जीवन मे बारबार पाने की कामना स्वस्थ बैठने नही देती उसी सन्मान को पाने की उसको आदतसी पड जाती है इसलिये वो हमेशा उसी माहोल मे जिना चाहता है या उसके विपरीत जो चनाव में पराजित हो जाता है उसे भविष्य में कभी न कभी जितने की जिद लग जाती है राजकारण में रहने वाले व्यकी भी आखिर किसी न किसी अपेक्षा से उनके साथ रहते है जब भी कभी कोई नेता चुनाव मे हार जाता है तब फिर से वो जितने के लिये पुरी शक्ती फिर से लगाता है फिर उचित और अनुचित का कोई फरक उसके मन मे नही होता सिर्फ और केवल विजय और मान सन्मान पाना यही एकमात्र उद्देश लिए चुनाव लड़ा जाता है |
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