किसी
भी व्यक्ती या प्राणी को थकान आसानी से नहीं आती। यह एक कर्ज की तरह है। कर्ज लेना
गलत नहीं है, लेकिन इसे समय पर चुकाना पड़ता है, नहीं तो व्यक्ति उस
ब्याज में डूब जाएगा और ज्यादा कर्जदार हो जाएगा। थकान के साथ भी ऐसा ही होता है।
हम शरीर, मन, बुद्धि का उपयोग करते हैं,
अगर हम इसे समय पर अपने आप को रिचार्ज
करते हैं, इस शरीर को थोडा आराम देते हैं,
तो इसकी थकावट दूर हो जाती है । यदि आप
ऐसा नहीं करते हैं, तो आप अपने आप को थका मह्सुस करेंगे ।थकान को आनेपर रोका नहीं
जा सकता। लेकिन, जिनके पास अच्छी शारीरिक और मानसिक क्षमताएं हैं, वे थकान का विरोध कर
सकते हैं। लेकिन आजकल ऐसा लगता है की हम इस क्षमता को नहीं बढ़ा रहे हैं। हम में
से कई लोग उचित आहार और उचित व्यायाम से सैकड़ों मील दूर हैं। सौ साल पीछे भी मत
जाओ। करीब 25 साल पीछे चलते हैं। आज के जैसे किचन में कोई इलेक्ट्रोनिक
उपकरण नहीं था। रवई घुसराई का उपयोग छाछ बनाने में होता था दैनिक उपयोग में, मूंगफली का पेस्ट या
चटनी मिक्सर में नहीं बनाया जाता था वो तो पत्थर पर पिसा जाता था । सीलबत्ते का
व्यापक रूप से उपयोग किया जाता था। गर्मियों में अचार, पापड़, मसाले, ये घर पर ही बनाते थे ये
काम गृहिणियां खुद करती थीं. शारीरिक परिश्रम रोज होता था, इसलिये आहार भी अच्छा
होता था। खाने के लिए किसी होटल में नही जाना पडता था अमीर हो या गरीब, हर घर में तांबे-पीतल
के बर्तन होते थे। कड़ाही लोहे की होती थी। कोई डाइनिंग टेबल वाली विधि नहीं हुआ
करती थी । सभी जमीन पर नीचे बैठकर भोजन करते थे। कोई कांटे
और चम्मच से नहीं खाते थे। लगभग हर घर में बहुत सारा दूध होता था। दूध, छाछ, मक्खन, घर का बना शुद्ध घी
बडी मात्रा में आहार में होता था |
रसोई में हाथो से पिसा मसाले का सामान
मुख्य था। खाना पकाने के लिए अलसी के तेल का इस्तेमाल किया जाता था। चार दिन तक घर
में बासी खाना रखने का रिवाज नहीं था। लेकिन अब घर-घर में रेफ्रिजरेटर आ रहे हैं।
कच्चा चिवड़ा, कच्ची या भुनी हुई मूंगफली,
कच्चे मटर के दाने मिर्च पाउडर के साथ
खाना बहुत ही आसान था. प्रत्येक व्यंजन का एक विशिष्ट मौसम था। तभी खाना घर मे
चुले पर बनता था । अक्षय तृतीया से पहले आमों को छुआ तक नहीं जाता था और जब पहली
बारिश हुई तो आमों को खाना बंद कर दिया जाता था।
आम,
बोर ,
आंवला,
और इमली जैसे फल बड़ी मात्रा में खाए
जाते थे। अब कितने बच्चे इस फलो को खाते हैं ?
शायद शहरी बच्चे तो न के बराबर ही होंगे
शायद गाव के बच्चे कुछ प्रतिशत खा सकते है |
सातवीं-आठवीं कक्षा के लड़के-लड़कियां
गुड़ नहीं जानते। गुड कैसे बनता है ये भी नही जाणते | आज घर घर मे रेडिमेड
केचप, सॉस, जैम, जायफल की बोतलें भरी हैं,
लेकिन असली देशी शहद की कोई बोतल नहीं
है। आजकल स्कूली बच्चों को घी निकालने की प्रक्रिया पता नही है | कटोरी में पके चावल
कैसे पकते है इसका पता ही नहीं । हर गुरुवार या शनिवार को जब कोई नारियल घर में
आता है तो वह क्यो लाया जाता है इसका पता नही होता नारियल का शरीर के लिये क्या
फायदा होता है इसकी बच्चो को जानकारी नही होती । हलवा लड्डू, विविध पदार्थ से बने
लड्डू हुआ करते थे। अब ये पदार्थ बच्चों के आहार से गायब हो गए हैं। ये पदार्थ
पूरे परिवार से गायब हो गए हैं। असली मेवे से बने
लड्डू बहुत पौष्टिक होते हैं, अब जितने पैसे से
लड्डू बनते थे उतने पैसे की साड़ीया घर मे आ रही है । पहले के जमाने मे वाशिंग
मशीन नहीं थी, कपड़े हाथ से धोने पड़ते थे। सबने अपने-अपने कपड़े धोए। यह आदत
घर सबके घर पर थी। लेकिन अब यह आदत विलुप्त होती जा रही है। लोग साइकिल का उपयोग
करते हुए लम्बा रस्ता पार जाते थे नजदीक वाली जगह लोग अधिकतम पैदलही जाया करते थे
। स्कूल से पैदल आना-जाना आम बात थी। सुबह-शाम एक गिलास दूध पिए बिना राहत नहीं
मिलती थी बच्चो से लेकर वृद्धो तक सभी लोग रोजाना दुध पिया करते थे । कितना भी
बोरिंग क्यों न हो पर मनोरंजन का एकमात्र सहारा गाव की चौपाल ही होती थी जहा सारे
जहा का ज्ञान रोज बटता था ,हर सवेरे और शाम के बाद कसरत करना पड़ता था, शाम को छ बजे
रामरक्षा करना तो जैसा अनिवार्य था। शायद कोई परिक्षा नहीं ले रहा था पर ये सब
करना तो एक आम रिवाज था | स्कूली बच्चों में आज थकान की समस्या आम बात हो गई है पर ये बडी
ही गंभीर बात है। लेकिन उसके भी कई कारण हैं। इनमें से ज्यादातर कारण जीवनशैली से
जुड़े हैं। साफ, सूती और रेशमी कपड़े पहने लोगों को देखो और तंग, रंगीन, चमकीले कपड़े पहने
हुए लोगों को देखो। उनके व्यक्तित्व में अंतर बुद्धिमानों द्वारा तुरंत देखा
जाएगा। अब तो स्कूल यूनिफॉर्म भी रंग-बिरंगी और बेकाबू हो गई है, आप उन रंगों में जोश
कैसे महसूस कर सकते हैं जिनका मन पर विपरीत परिणाम पडता है | नीला
सफेद और हरा रंग ही युनिफॉर्म के लिये सही होते है ये रंग शीतल होते है इसलिये
इनके ही उपयोग वाले स्कूल के युनिफॉर्म होणे चाहिये | पर आज जो कपडा बडी
मात्रा मे बच जाता है उसको काम मे लाने के लिये युनिफॉर्म बनाये जा रहे है | हर शाम मैदान पर
खेलना चाहिये । बारिश में कभी कभी भिगना भी चाहिये पर आज ये सब नही हो रहा | लोग उस जमाने मे रात
में बच्चे एक साथ आंगन में या छत पर सोते थे। रात भर जागना मना था। रात करीब आठ
बजे खाना भी छूट गया। लेकिन, खाना किचन में होता था। टीवी देखना और खाना खाने का तरीका नहीं
था। अब भी रात के आठ बजे खाना परोसा जाता है,
लेकिन टीवी पर भूमिगत महिलाओं के सीरियल
देखे जा रहे हैं! इससे अन्न के साथ वही विचार शरीर मे जा रहे है जो जाने नही
चाहिये | अन्न और विचार हमारा जीवन सवारते है पूरे जीवन में किसी को भी
केवल आराम नही था, यदी घर मे कोई कम बुद्धी है तो उसे गाय चरवाणे भेज दिया जाता
था | बहुत सारी खुशियाँ घर मे होती थीं। लोगों के पास एक-दूसरे को
देने के लिए पैसे नहीं थे, लेकिन समय बहुत था। जो एकमेक को दिया जाता था अब
आपके पास अपने लिए और दूसरों के लिए समय नहीं है |
माना की जिंदगी इतनी तेज नहीं थी, बहुत धीमी थी। लेकिन, यह जीवन थकाऊ नहीं
था। लोग दैनिक जीवन में जल्दी निकलो ,
धीरे जाओ,
सुरक्षित पहुंचो" के सिद्धांत का
उपयोग कर रहे थे। और उसी की वजह से वे जीवन जीने में सक्षम भी थे। आज ज़िंदगी बस
जल्दी में है..! लोगों ने जान-बूझकर खुद को बहुत बड़ी बडी महत्वाकांक्षाओं से घेर रखा
है । सादगी भरा जीवन भी थकान से बचने का एक प्रमुख कारण होता है । उस जमाने मे
लोगों के जीवन में कोई अकेलापन नहीं था। अपना ज्यादातर समय दूसरों के साथ बिताया
करते थे । सभी के आसपास बहुत सारे लोग हुआ करते थे। रुठना या अपने लिये किसी के
प्रती अवहेलना वाली धारणा मे स्पष्टता होती थी। क्योंकि छिपाने के लिए कुछ भी नहीं था। घरो
के साथ साथ मन के दरवाजे बंद नहीं थे। ज्यादातर दरवाजों में ताले नहीं हुआ करते
थे। कभी घर के सदस्य किसी गाव या कार्यक्रम मे जाते तो घर पर कोई न कोई जरूर होता
था | पड़ोसी कुछ खा भी ले तो उसका कटोरा घर पर भर कर आ जाता था । सब
मे प्रेम था और कर्मकांड भी बडे पैमाने पर था । इस वजह से लोग साल मे कम से कम एक
दो बार पुरे परिवार या गाव से मुलाकात कर लेते थे |
लोगों की देखभाल करने की समग्र
प्रवृत्ति थी। इसलिए, तारो और जोतिष्य जैसे विद्या पर लोग विश्वास भी रखते थे | उस जमाने मे अपने
लडको और लडकीयो के रिश्ते बडे बुजुर्ग करते थे |
शादी पक्की करने से पहले लडकी के पाव और
हात देखे जाते थे उसका प्रमाण यही था की किसी प्रकार की त्वचा की बिमारी तो नही है
| आज ये सभी न के बराबर हो रहा है | शिक्षा के नाम पर
व्यापार हो रहा है | बुजुर्ग परिवार मे न होने से किभी भी तरह के फैसले लेने मे
जल्दबाजी हो रही है | इसी कारण आज का जीवन बडा असंतुलित हो गया है |
www.vinoddahare.blogspot.com

No comments:
Post a Comment