साथियो दुनिया में काफी ऐसे लोग होते है जो अपना व्यापार और दानधर्म दोनों को बड़े ही सादगी से अपने सम्पूर्ण जीवन में करते है | वो चाहे तो अकेले ही इतना बड़ा दानधर्म के काम कर सकते है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती | ऐसी ही एक रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी आपके लिए आज लेकर आया हु जिसको जानकर आप भी दया दान के कर्मो के लिए अवश्य ही प्रेरित हो जायेंगे | तो साथियो आज हम जानते है ऐसे ही एक सेना से सेवानिवृत्त हो चुके एक फौजी की कहानी जिन्होंने सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद अपने गाव से ही लगकर महामार्ग के बाजु में अपना एक रेस्तरां खोला | फौजी को साफ सफाई बहोत ही ज्यादा पसंद थी और पूरी जिंदगी अनुशासन में चली गई थी इसलिए थोड़े सख्त स्वाभाव के बन गये थे | मगर फौजी के मन में गरीब और भूखे प्यासे लोगो के लिये दया भी थी | वो हमेशा अपने रेस्तरां में जरुरत मंदों की मदत किया करते थे | जिनके पास पैसे नहीं होते थे उन्हें मुफ्त में खाना खिलाना उनका धर्म बन चूका था | काफी दिन तक ये सब चलता रहता था | अब तो लोगो ने भी वहा मुफ्त के खाने के लिए झुट मुठ का सहारा लेना चालू कर दिया था | ये बात फौजी के समझ में आ गई थी | अब लोगो का इस तरह से गलत व्यवहार उन्हें मन ही मन कचोटता था | फिर उन्होंने सोचा जो सच्चे भूखे प्यासे लोग जिनकी सही में कोई मज़बूरी हो सकती है उन्हें खाना खिलना तो धर्म है मगर जो जानबूझकर मुर्ख बनाने आते है | वो तो ठीक नही है | मगर करे भी तो क्या करे | इसलिए उन्होंने एक योजना बनाई | अपने रेस्तरां में उन्होंने कुल बिकने वाली खाने की थालियो में से कुल 5 प्रतिशत थालिया उन जरुरत मंदों के लिए राजर्व कर दी | होटल बंद होने की स्थिति में ये खाने की थालिया उन जरुरत मंदों को दी जाती जो सही में इसके हक़दार थे | मगर इससे भी इस समस्या का हल नही निकल पाया क्यो की कभी कभी काफी ज्यादा मात्रा में लोग शेष रह जाते और थालिया कम पड जाती थी | फिर सारे लोगो की गिनती करके सभी में वो खाना सामान रूप से खाना बाट दिया जाता था | एक दिन रात को नींद न आने के कारण फौजी बड़े ही परेशान थे एक दम से उन्हें कुछ सुझा और अगले दिन उन्होंने एक उपाय किया | एक गोल चक्री पर ० रु , 5 रु १०रु १५ रु ऐसे आंकडे चिपका दिए और रेस्तरां में आये गृह्को से निवेदन किया की वो उस चक्र को अपने हाथो से घुमाने पर जिस अंक पर चक्री रुक जाएगी उतने रूपए उनके बिल से कम किये जायेंगे | मगर इस के लिए उन्हें हर बार की चक्री के लिए केवल 5 रुपये देने होंगे जिनसे गरीब और भूखे लोगो को हर दिन यहाँ खाना खिलाया जायेगा | योजना को समझने के बाद ग्राहक पहले 5 रुपये डब्बे में डालते और चक्री घुमाते किसी को १० रुपये का फायदा मिलता तो किसी को 5 रूपये का फायदा होता तो किसी किसी को शून्य आ जाता अब लोग जो भी फायदा होता उतने पैसे तो उसी डिब्बे में फिर डाल देते वो अपने मन में यही सोच रखते की यदी भगवान में हमें ये पैसे दिए है तो यक़ीनन उन गरीबो को मदत करने के लिए ही दिए है | ऐसे से उस डिब्बे में कुछ लोग तो अपने पास के ५० , १०० रुपये भी अलग से डाल देते थे | निहित समय पर डबे को खोलकर पैसो का हिसाब होता था और उतने पैसे की खाने की थालिया गरीब और जरुरत मंदों को कूपन द्वारा बाट दी जाती थी जिस दिन पैसे ज्यादा होते थे और खाना खाने वाले जरुरतमंद लोग कम आ जाते थे उस दिन की बची कुपन अगले दिन या उससे अगले दिन उपयोग में ली जाती थी | हर जरुरत मंद को खाना मिल जाता था | फौजी ने फिर एक नई योजना बनाई | अपने रेस्तरां में जो लोग खाना खाने के लिए आते उनमे से कुछ लोग दया धर्म वाले होते थे | तो रेस्तरां में कुछ कम पैसे वाली डिश होती थी जिनके लिए वो आमिर लोग पैसे दे देते थे और उस पैसे का कूपन एक अलग रखे प्लास्टिक के बॉक्स में जाकर डाल देते थे जिससे जरुरत मंद् लोग किसी भी समय उस कूपन से उस रेस्तरां में वो डिश का खाना खा सकते थे | ऐसे से गरीब ट्रक ड्रायवर या गरीब मुसाफिर जिनके पास काफी कम पैसे होते थे वो इस योजना का लाभ लेते थे | देखते ही देखते रेस्तरां बड़ा फेमस हो गया | इसे देखने के लिए काफी लोग आने लगे | इसके काम करने की कार्यप्रणाली को समझ ने के लिए अब तो बड़े बड़े MBA के विद्यार्थी भी आने लगे | फौजी के मन में एक बात काफी दिनों से घूम रही थी | वो हमेशा सोचता रहता रेस्तरां के सामने से हमेशा फौजी भाई अपनी ड्यूटी करने जाते है या तो ड्यूटी ख़त्म होने के बाद अपने घर वापस जाते है इनके लिए क्या कर सकता हु ? उसने सोचा यदी मै ऐसा ही एक बॉक्स यहाँ लगा देता जो सेना के जवानों की मदत करेगा सेना के जवान तो अनुशासन में रास्ते में कभी कुछ भी नही खा सकते इसलिए हम उन्हें खाना नही खिला सकते | इसलिए भारतीय सेना में वीरगति पाने वाले सैनिक के उस तहसील ,जिल्हे में जितने भी परिवार है उनके लिए लिए कुछ आर्थिक मदत यदी कोई करना चाहता है तो उनके लिए वो अपना योगदान करे | लोग रेस्तरां में आते और अपने देशप्रेम को उजागर करते अपने तरफ से जो भी मदत करना चाहते थे वो उस बॉक्स में डाल देते थे | महीने के अंत में बॉक्स को खोलकर जितने भी रुपये जमा होते उसका मनीआर्डर उन शहीदों की घर भेज दिया जाता था | इससे उस शहीद के घर वालो के थोड़ी सी आर्थिक मदत हो जाती | और अपने फौजी भाई जिन्होंने अपने देश के लिए बलिदान दिया है उनका भी सन्मान होता था | साथियो यह कथा मेरे विचारो पर आधारित है वास्तविकता में कथा के किसी बात से मेल खाती है तो यह केवल एक संयोग होगा | भविष्य में ये कभी न कभी होगा ऐसा मेरा मानना है | www.vinoddahare.blogspot.com

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